इतिहास को अन्य विषयों से किस प्रकार जोड़ें in Hindi


how to link history with other subjects



नमस्कार दोस्तों, अक्सर हम लोग सोचते हैं कि इतिहास, भूगोल, अर्थशास्त्र, समाजशास्त्र इत्यादि सभी अलग-अलग विषय हैं, इनका आपस में कोई संबंध नहीं है। हम हमेशा ये मानते हैं कि इतिहास का भूगोल से, अर्थशास्त्र से, समाजशास्त्र से, या भूगोल का इन अन्य विषयों से अर्थात इन सभी विषयों का आपस में कोई भी संबंध नहीं होता, परंतु हमारा यह मानना पूर्णतः उचित नहीं है। अगर हम देखें तो ये सभी विषय अलग होने के साथ-साथ एक दूसरे से जुड़े हुए भी हैं।


 आज हम इसी पर चर्चा करेंगे कि किस प्रकार ये सभी विषय आपस में जुड़े हुए हैं, किस प्रकार हम इतिहास का अध्ययन करते हुए समाजशास्त्र, अर्थशास्त्र, भूगोल या अन्य कोई भी विषय इसमें जोड़ सकते हैं, समझ सकते हैं, जिससे इन सभी को एक साथ जोड़कर समझने में आसानी हो और इससे हमारे समय की भी बचत हो।

सबसे पहले हम यह समझते हैं कि हमें इन विषयों के अध्ययन की आवश्यकता क्यों है?

एक उदाहरण के माध्यम से इसे समझते हैं। हमारे आज के आधुनिक जीवन में जब हम किसी समस्या में पड़ते हैं या किसी ऐसी परिस्थिति में पढ़ते हैं जिनका सामना हमारे कुछ परिचित जैसे माता-पिता, दादा-दादी, अध्यापक या हमारे कोई मित्र, कोई रिश्तेदार पहले ही कर चुके हों, या हमें कहीं जाना हो किसी अनजान जगह पर जहां हमारा कोई परिचित पहले जा चुका हो तो हम क्या करते हैं? हम पहले उनसे इसकी चर्चा करते हैं, उनका अनुभव लेते हैं, वहां के बारे में जानकारी लेते हैं, उन परिस्थितियों से, उन समस्याओं से वे लोग कैसे निपटें,इसमें उनका अनुभव लेते हैं और उसके आधार पर हम भी इन परिस्थितियों का सामना करते हैं।

अब जैसे हमें किसी समाज के बारे में किसी सभ्यता के बारे में किसी संस्कृति के बारे में कुछ जानना है उसकी गहराई जानना है, उसकी विशेषता और कमियां जानना है तो हम क्या करेंगे हम इसकी चर्चा अनुभवी लोगों से करेंगे। उन लोगों से करेंगे जिन्हें इनके बारे में कुछ ज्ञान हो, जिन्हें इनकी समझ हो।

 ऐसा करने से हमें इन विषयों को समझने में आसानी होगी और इसीलिए हमें इन सभी विषयों को अच्छे से समझना चाहिए। उनका अध्ययन करना चाहिए ताकि हमे अपने दैनिक जीवन में, अपने व्यावहारिक जीवन में किसी प्रकार की समस्या का सामना ना करना पड़े और यदि कभी हम इन परिस्थितियों में पड़ते हैं तो हम इनका सामना कुशलतापूर्वक कर सकें। 
अब इसमें हमने देखा कि किस प्रकार हम अपने वर्तमान को इतिहास से, भूगोल से या अन्य विषयों से जोड़ सकते हैं। इसी प्रकार अर्थशास्त्र, समाजशास्त्र, नागरिक शास्त्र या अन्य कोई भी विषय जिसको हम अपने वर्तमान, अपने अतीत और अपने भविष्य से जोड़कर समझ सकते हैं।


अब आप कहेंगे कि इतिहास का भविष्य से क्या संबंध है? 

साथियों इतिहास का जिस प्रकार से हमारे वर्तमान से संबंध है उसी प्रकार से यह हमारे भविष्य से भी जुड़ा है, कैसे? एक उदाहरण से समझते हैं हम अपने आधुनिक जीवन की अपने पूर्वजों के जीवन से तुलना करें, विचार करें, उन्होंने उस समय क्या किया जिसके आज क्या परिणाम हो रहे हैं? उन्होंने उस समय किस प्रकार से अपने जीवन का निर्वाह किया, किस प्रकार से अपनी आजीविका चलाई, किस प्रकार से अपनी संस्कृति का निर्माण किया एवं उनका पालन किया और उन कार्यों के आज जो भी फल मिल रहे हैं, परिणाम मिल रहे हैं, इसकी तुलना करके आप अपने आज के कार्यों आज की परिस्थितियों एवं संस्कृतियों के आधार पर यह विचार कर सकते हैं कि हमारा भविष्य किस प्रकार का होगा, हमारे आज के कार्यों के क्या परिणाम होंगे, हम जो आज कर रहे हैं वैसा हमारे पूर्वजों ने क्यों नहीं किया और अगर किया तो उसके आज के परिणाम के आधार पर हम अपने कार्यों को सुधार सकते हैं उनसे प्रेरणा ले सकते हैं अपने आने वाली पीढ़ियों को उदाहरण दे सकते हैं उनका भविष्य सुधार सकते हैं।

अब मूल विषय की चर्चा करते हैं जिसके बारे में यह लेख लिखा गया है।

हमारा विषय था कि हम इतिहास को अन्य विषयों से किस प्रकार जोड़ें?

उदाहरण के तौर पर हम सिंधु सभ्यता लेते हैं। सिंधु सभ्यता जो कि इतिहास का विषय है, अब इसका संबंध हम भूगोल, अर्थशास्त्र, समाजशास्त्र से किस प्रकार स्थापित कर सकते हैं, हमें इसी पर चर्चा करनी है।

मित्रों ये तो आप जानते ही हैं सिंधु सभ्यता या हड़प्पा सभ्यता की खोज दयाराम साहनी ने 1921 में किया था। मोहनजोदड़ो की खोज राखालदास बनर्जी ने 1922 में किया था। ये तो इतिहास की बात हुई। 
मोहनजोदड़ो को मृतकों का टीला क्यों कहा जाता है, ये हुआ भूगोल का विषय।
सिंधु सभ्यता कितने वर्ष पुरानी है यह तो इतिहास का विषय है परंतु इसे सिंधु सभ्यता क्यों कहा गया?, यह सिंधु नदी के तट पर क्यों विकसित हुई? आखिर ये प्राचीन संस्कृतियां चाहे वह सिंधु सभ्यता हो, मिस्र की सभ्यता हो, मेसोपोटामिया की सभ्यता हो, ये सभी नदियों के तट पर ही क्यों विकसित हुई, ये हुआ भूगोल का, अर्थशास्त्र का एवं समाजशास्त्र का विषय।


अर्थशास्त्र एवं समाजशास्त्र का किस प्रकार से? समझते हैं, ये प्राचीन सभ्यताएं नदियों के तट पर इसलिए विकसित होती थी क्योंकि प्राचीन काल में आज की तरह सिंचाई के लिए नलकूप नहीं थे इस वजह से लोग नदियों के तट पर अपना निवास बनाते थे ताकि खेतों में सिंचाई के लिए पर्याप्त जल मिल सके, प्राचीन काल में लोग मिट्टी के बर्तनों का प्रयोग करते थे, जिनके निर्माण के लिए गीली मिट्टी की आवश्यकता होती थी जो नदियों के तट पर आसानी से मिल जाती थी। जो लोग मिट्टी के बर्तनों का व्यापार करते थे, उन्हें इसके निर्माण के लिए बड़ी मात्रा में मिट्टी एवं जल की आवश्यकता होती थी, जो नदियों के तट पर आसानी से उपलब्ध हो जाती थी, यह तो विषय हुआ अर्थशास्त्र का। 


अब बात करते हैं समाजशास्त्र, उस समय आज की तरह घरों में नल नहीं होते थे। दिनचर्या के लिए जो भी जल की आवश्यकता होती थी वह नदियों से पूरी हो जाती थी। उस समय की सामाजिक परिस्थिति ऐसी थी कि महिलाओं एवं पुरुषों के कार्य बंटे हुए थे। पुरुष जिनका कार्य धन कमाना होता था एवं महिलाएं घर संभालती थी। इसलिए नदियों से जल लाने के लिए महिलाएं ही जाया करती थीं। नदियों के तट पर रहने के कारण उन्हें जल लाने के लिए दूर तक नहीं जाना पड़ता था, ये हुआ समाजशास्त्र।


इस प्रकार हमने आज यह जाना कि हम सभी विषयों को एक दूसरे से जोड़ कर किस प्रकार से समझ सकते हैं, किस प्रकार इतिहास, भूगोल, अर्थशास्त्र एवं समाजशास्त्र एक दूसरे से जुड़े हुए हैं।
 इसी प्रकार अन्य सभी विषयों को भी जब हम एक दूसरे से जोड़कर अध्ययन करेंगे तो अध्ययन करने में हमारा समय भी बचेगा और अध्ययन करने में आसानी होगी।

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