Sanatan Dharma का मूल स्वरूप क्या है | समाज में सांप्रदायिकता क्यों बढ़ रही है

आज पूरे विश्व में ना जाने कितने धर्म बन चुके हैं जबकि वास्तव में धर्म सिर्फ एक ही है- सनातन धर्म। 

धर्म किसी व्यक्ति या समुदाय के लिए परिवर्तित नहीं होता, धर्म केवल परिस्थितियों के अनुसार और पद की आवश्यकताओं के अनुरूप ही परिवर्तित होता है। व्यक्ति कोई भी हो, समुदाय कोई भी हो, किसी एक समान परिस्थिति में उसका धर्म एक ही होगा। हां, उसकी संस्कृति, उसकी विचारधारा, उसके रहन-सहन के तरीके, खानपान, वेशभूषा, बोली, भाषा ये सभी चीजें अलग अलग हो सकती हैं, किंतु धर्म नही। क्योंकि किसी परिस्थिति में किसी व्यक्ति अथवा समुदाय के लिए उसका कर्तव्य, उसका फर्ज और उसका कर्म ही उसका धर्म होता है। 


धर्म का मूल स्वरूप

एक वाक्य में कहें तो परिस्थितियों के अनुरूप मनुष्य, पद अथवा किसी संस्थान से अपेक्षित कर्तव्य ही उस मनुष्य, उस पद अथवा उस संस्थान का धर्म होता है। और भी सरल शब्दों में कहें तो वह हर कर्म धर्म है, वह हर कर्तव्य धर्म है, जिससे आत्मा एवं परमात्मा के बीच की दूरी कम होती है और वह हर एक कर्म अधर्म है जिससे आत्मा एवं परमात्मा के मध्य की दूरी बढ़ती है। यही धर्म का मूल स्वरूप है, यही धर्म का मूल सार है, इसी को सनातन धर्म कहते हैं।


यदि मनुष्य अपने सारे कार्य अपनी अंतरात्मा की आवाज के आधार पर, अंतरात्मा की प्रेरणा से करें तो वह सदैव धर्म के पथ पर ही चलेगा परंतु जब मनुष्य अपनी अंतरात्मा की आवाज को अनसुना करने लगता है और अपनी इंद्रियों के अनुरूप चलने लगता है तो वह धर्म के पथ से विचलित हो जाता है और निश्चित ही वह अधर्म की ओर बढ़ने लगता है।


किसी राजा से प्रजा की जो अपेक्षाएं होंगी, उसको पूर्ण करना राजा का धर्म होता है। प्रजा से राज्य की जो अपेक्षाएं होंगी, उसको पूर्ण करना प्रजा का धर्म होता है। किसी राष्ट्र की अपने नागरिकों से जो अपेक्षाएं होंगी, उसका पालन करना, उसको पूर्ण करना उस राष्ट्र के नागरिकों का धर्म होता है, राष्ट्र धर्म होता है। किसी राष्ट्र की अपने राजा की से, अपने शासक से जो अपेक्षाएं होंगी, अपने राज्य के पदाधिकारियों से जो अपेक्षाएं होंगी, उनको पूर्ण करना, उनका पालन करना उस राजा का और उस राज्य के पदाधिकारियों का धर्म होता है, राजधर्म होता है। 


किसी पुत्र से उसके माता-पिता की और माता-पिता से उसके पुत्र की जो अपेक्षाएं, आशाएं और उम्मीदें होंगी, उन्हें पूर्ण करना पुत्र का या उसके माता-पिता का धर्म होता है। अपनी संतानों को सही शिक्षा, सही संस्कार देना माता पिता का धर्म होता है। अपने माता पिता की सेवा करना उन्हे खुश रखना संतानों का धर्म होता है। किसी गरीब, दीन दुखिया की सहायता करना, उनकी रक्षा करना सक्षम लोगों का धर्म होता है। खेती करना, फसल उगाना किसानों का धर्म होता है। व्यापार करना व्यापारियों का धर्म होता है। लोगों को सही गलत का ज्ञान देना विद्वानों का, ब्राम्हणों का धर्म होता है। शिष्य को सही ज्ञान देना गुरु का धर्म होता है। 


इस प्रकार हम देख सकते हैं कि किसी व्यक्ति के, किसी समुदाय के या किसी पद पर बैठे हुए व्यक्ति के पद, परिस्थितियों और रिश्तों के अनुरूप जो कर्तव्य आवश्यक है, उसे धर्म कहते हैं।


सनातन धर्म ही सभी धर्मों का मूल स्वरूप है

इस प्रकार पूरे विश्व में धर्म सिर्फ एक ही है-सनातन धर्म।  विभिन्न संस्कृतियों, विभिन्न रीति-रिवाजों, विभिन्न परंपराओं, रहन-सहन, खानपान, अपनी आस्था प्रकट करने के विभिन्न तरीकों, विभिन्न देवों को ईष्ट मानने से धर्म अलग नहीं होता बल्कि पंथ/मत या संप्रदाय अलग-अलग होते हैं। इसलिए जितने भी संप्रदाय विश्व में हैं-हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई, जैन, बौद्ध, शैव, वैष्णव सभी सनातन धर्म, सनातन परंपरा के ही एक अभिन्न अंग हैं, इन्हे अलग-अलग चश्मे से, अलग-अलग नजरिए से नहीं देखा जा सकता। हमारे रहन-सहन बदले हैं, हमारी परंपराएं, रीति रिवाज, हमारी मान्यताएं बदली हैं परंतु कर्म से हर कोई सनातन धर्म से ही जुड़ा हुआ है। उन्हें इस प्रकार से अलग-अलग परिभाषित करना, उनमें वैर भाव, वैमनस्य पैदा करना निश्चित ही अधर्म है। 


समाज में सांप्रदायिकता बढ़ने और धर्म के पतन का कारण

सभी धर्मों के धर्मगुरुओं को इस बात का ध्यान रखना होगा कि उन्हें केवल विभिन्न मान्यताओं, परंपराओं, संस्कृतियों की रक्षा करनी है ना कि विभिन्न संस्कृतियों के आधार पर उनमें आपस में बैर भाव या वैमनस्य पैदा करना। धर्मगुरु का अर्थ ही होता है लोगों को धर्म की सही सीख देना ना कि धर्म की गलत व्याख्या करके उन्हें मुख्यधारा से भ्रमित करना। आजकल अनेक धर्मगुरु, मुल्ला मौलवी, पादरी लोगों से धर्म की गलत  व्याख्या करके उन्हें जेहाद करने को, उन्हें कट्टर बनने को, उन्हें दूसरों की संपत्तियों को नष्ट करने के लिए उकसाते रहते हैं, उन्हें अन्य संस्कृतियों के, अन्य संप्रदायों के व्यक्तियों को मारने के लिए, उनसे नफरत करने के लिए, उनसे दूर रहने के लिए उकसाने रहते हैं, अन्य संस्कृतियों, अन्य विचारधाराओं और अन्य संप्रदायों को मानने वाले लोगों को भय, लोभ अथवा लालच दिखा कर जबरन उन पर अपनी संस्कृति, अपना संप्रदाय, अपनी विचारधारा थोपने के लिए प्रेरित करते रहते हैं, यह निश्चित ही उनके गिरे हुए स्तर और उनकी अज्ञानता को प्रदर्शित करता है। 


विशेष रुप से धर्म की मर्यादा और धर्म का स्तर तब और अधिक गिर जाता है और अधिक खंडित होता है जब इसकी व्याख्या कोई योग्य धर्मगुरु ना करके अज्ञानी राजनेता करने लगता है। कोई ऐसा व्यक्ति करने लगता है जिसे धर्म के मर्म का 1% भी ज्ञान ना हो। जैसा कि वर्तमान समय में तमाम नेता लोग कर रहे हैं जो खुद को किसी धर्म का असली अनुयाई साबित करने की होड़ में लगे हुए हैं। कुछ समय पहले तक जो लोग मंदिर जाने वालों को लफंगे कहा करते थे, आज केवल और केवल चुनाव के लिए सत्ता के लोभ के लिए मंदिर मंदिर भटक रहे हैं। यह राजनेताओं के गिरे हुए स्तर को नहीं तो और क्या दिखाता है? 


आज पूरे विश्व में लोगों की धर्म के प्रति अज्ञानता और नासमझी की वजह से धर्म के मूल स्वरूप को छिन्न-भिन्न कर अलग-अलग पंथों को, अलग-अलग संस्कृतियों को अलग-अलग धर्म का नाम देकर समाज में इतनी अधिक वैमनस्यता भर दी गई है कि आज हर व्यक्ति, हर समुदाय धर्म नाम सुनते ही उसे आस्था से जोड़ देता है, उसे उसकी सांस्कृतिक पहचान से और सांस्कृतिक क्रियाकलापों से जोड़ देता है। धर्म के मूल स्वरूप को न तो कोई जानना चाहता है और न ही समझना बल्कि एक दूसरे की पूजा पद्धतियों को, ईश्वर में आस्था प्रकट करने के विभिन्न तरीकों को ही धर्म की पहचान मान ली गई है और इन सब का मूल कारण धर्म गुरुओं में ज्ञान का नाश होना और उनमें कर्तव्य भाव का पतन होना है, धर्म गुरुओं के चरित्र का पतन होना है। इन तथाकथित सभी धर्मों के, सभी संप्रदायों के तथाकथित सभी धर्मगुरु, मुल्ला मौलवी, पादरी या कोई भी, जो खुद को धर्मगुरु समझता हो, वास्तव में इनमे से किसी को भी धर्म के मर्म का, धर्म के वास्तविक स्वरूप का 1% भी ज्ञान नहीं है।


धर्म के मूल स्वरूप की इसी अज्ञानता की वजह से आज पूरे विश्व में धर्म के नाम पर लोगों के मध्य, देशों के मध्य, समाज के मध्य, समुदाय के मध्य विभिन्न संस्कृतियों, विभिन्न विचारधाराओं और विभिन्न संप्रदायों की वजह से सांप्रदायिक मतभेद उत्पन्न होते जा रहे हैं, जिन्हें धर्म युद्ध की संज्ञा भी दी जा सकती है।  


हिंदू धर्म का मूल स्वरूप ही सनातन धर्म है

वास्तव में धर्म का मूल स्वरूप तो सनातन धर्म ही है और उसी सनातन धर्म का ही एक अन्य नाम है- हिंदू धर्म, जिसे हिंदू नाम 2500 साल पूर्व आए यूनानियों ने दिया था। इसी सनातन  धर्म से टूट टूट कर विश्व में अनेक धर्म में बने। ईसाई धर्म बना इसी सनातन धर्म से, इस्लाम बना इसी सनातन धर्म से। इसी सनातन धर्म की मूल शिक्षा योग और अध्यात्म का ज्ञान महात्मा बुद्ध, महावीर स्वामी और गुरु नानक साहब ने दिया किंतु उनके नाम पर भी लोगों ने अलग-अलग धर्म मान लिया और आज इसी सनातन हिंदू धर्म के भी खंड बनते जा रहे हैं। बौद्ध, जैन और सिख अपने आप को हिंदू धर्म से भिन्न मान रहे हैं जबकि ये सभी हिंदू धर्म के ही अभिन्न अंग हैं। संविधान में भी इन्हें हिंदू धर्म के अंतर्गत ही माना गया है फिर भी समाज के अंदर ऐसी भ्रांतियां बढ़ती चली जा रही है कि ये सभी हिंदू धर्म से सनातन धर्म से भिन्न हैं।


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